देहरादून। निजी स्कूलों की फीस वृद्धि का मुद्दा लंबे समय से अभिभावकों और छात्रों के बीच असंतोष का कारण रहा है। हर वर्ष नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में फीस और अन्य शुल्कों में बढ़ोतरी की खबरें आती हैं, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। एनसीईआरटी किताबों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। एनएसयूआई कार्यकर्ताओं का कहना है कि शिक्षा को व्यवसायिक दृष्टिकोण से देखना समाज के हित में नहीं है। यदि शिक्षा केवल लाभ कमाने का साधन बन जाएगी तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करना कठिन हो जाएगा।
एनएसयूआई की प्रमुख मांगें
- फीस रेगुलेटरी एक्ट को सख्ती से लागू किया जाए।
- जिला स्तर पर शिकायत समिति गठित की जाए।
- किताबों की कीमतों में हुई वृद्धि को सब्सिडी देकर कम किया जाए।
- निजी स्कूलों द्वारा ट्यूशन फीस और अन्य शुल्कों में मनमानी पर रोक लगाई जाए।
एनएसयूआई ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार शिक्षा को जनकल्याणकारी दृष्टिकोण से देखती है तो उसे निजी स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लगाना होगा। शिक्षा का अधिकार हर बच्चे का मौलिक अधिकार है और इसे किसी भी तरह से बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
एनएसयूआई ने कहा कि यदि सरकार ने जल्द कार्रवाई नहीं की तो छात्रसंघ अभिभावकों के साथ मिलकर बड़े स्तर पर आंदोलन करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यह आंदोलन शांतिपूर्ण भी हो सकता है और उग्र भी, यह सरकार की कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
निजी स्कूलों की फीस वृद्धि का असर केवल अभिभावकों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि समाज के व्यापक वर्ग पर भी होता है। जब शिक्षा महंगी होती है तो गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे पीछे रह जाते हैं। इससे सामाजिक असमानता बढ़ती है और शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
एनएसयूआई का यह प्रदर्शन शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। यदि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान देती है तो इससे अभिभावकों और छात्रों को बड़ी राहत मिलेगी। शिक्षा को जनहितकारी बनाने के लिए आवश्यक है कि फीस और किताबों की कीमतें नियंत्रित हों और निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगे।










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