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संस्कृत को कर्मकांड से जोड़ना अधूरा सच : कुलपति

हरिद्वार। भारतीय ज्ञान परंपरा एवं विकसित भारत में संस्कृत का योगदान’ विषय पर सोमवार को राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। लेखक गांव थानों में आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने की। कार्यक्रम में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडेय ने कहा कि यह संगोष्ठी केवल अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की आत्मा से संवाद का प्रयास है। उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल धर्म और कर्मकांड से जोड़ना अधूरा सच है। आर्यभट्ट का शून्य, भास्कराचार्य का कलन और वराहमिहिर की बृहत्संहिता भारतीय ज्ञान परंपरा की महान उपलब्धियां हैं। उन्होंने बताया कि आज भी आईआईटी में पाणिनि के व्याकरण का अध्ययन कंप्यूटर साइंस में कराया जाता है। चिकित्सा विज्ञान में चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे ग्रंथों को पूरी दुनिया मान्यता देती है। चरक ने 2000 वर्ष पहले ही कहा था कि रोग पहले मन में उत्पन्न होता है, फिर शरीर में। कार्यक्रम में संस्कृत शिक्षा मंत्री धनसिंह रावत, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास बरखेड़ी, महामंडलेश्वर कैलाशानंद ब्रह्मचारी सहित अनेक गणमान्य लोग शामिल रहे। इस अवसर पर लेखक गांव थानो में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय एवं स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय के बीच एक एमओयू भी हस्ताक्षरित किया गया।

 

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