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विकास के नाम पर लोगों को विस्थापित करने वाला मॉडल पर्यावरण के लिए नुकसानदायक : मैखुरी

विकासनगर।  किशाऊ बांध के लिए गांव डूबने और विस्थापन की आशंका के बीच मंगलवार को क्वानू में ग्रामीणों का विरोध तेज हो गया है। भाकपा (माले) के प्रतिनिधिमंडल ने गांव पहुंचकर ग्रामीणों से मुलाकात की और उनके आंदोलन के समर्थन का भरोसा दिया। ग्रामीणों ने कहा कि क्वानू की उपजाऊ जमीन पर मक्का और टमाटर की फसल होती है, जिसकी पैदावार दिल्ली की मंडियों तक पहुंचती है। ऐसे में गांव और खेती को बांध के लिए डुबोया जाना उन्हें मंजूर नहीं है। ग्रामीणों के मुताबिक परियोजना की प्रक्रिया शुरू होने से पहले उन्होंने उत्तराखंड जल विद्युत निगम के अधिकारियों के सामने अपनी आपत्तियां और चिंताएं रखी थीं।अधिकारियों की ओर से सकारात्मक कार्रवाई का भरोसा भी दिया गया, लेकिन बाद में उनके सुझावों और आपत्तियों को दरकिनार कर परियोजना की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि वे गांव और अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष जारी रखेंगे। भाकपा माले के राज्य सचिव इन्द्रेश मैखुरी ने आरोप लगाया कि विकास के नाम पर लोगों को विस्थापित करने वाला मॉडल प्रकृति और पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। उन्होंने कहा कि राज्य में विस्थापितों के पुनर्वास और प्रतिपूरक वृक्षारोपण के लिए जमीन की उपलब्धता को लेकर सरकार के सामने गंभीर सवाल हैं। भाकपा (माले) के गढ़वाल सचिव और जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक अतुल सती ने कहा कि जोशीमठ में जल विद्युत परियोजनाओं के खिलाफ लोग दो दशक से अधिक समय से संघर्ष कर रहे हैं। परियोजनाओं से होने वाले नुकसान और विस्थापन की पीड़ा को देखते हुए वे क्वाणु के ग्रामीणों के संघर्ष में उनके साथ खड़े हैं। जल, जंगल और जमीन की रक्षा का सवाल किसी एक गांव तक सीमित नहीं है। इस दौरान ग्राम प्रधान युद्धवीर सिंह, स्याणा सुरेंद्र सिंह चौहान, कोटा के प्रधान वीरेंद्र वर्मा, भगत राम जोशी, सरदार सिंह, मोर सिंह और नरेंद्र राणा समेत ग्रामीण मौजूद रहे।

 

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